Doctor Ajay Goyal

नोटिस पीरियड

ग्यारह साल तक शालिनी का नाम रिया रहा।

नोएडा के सेक्टर बासठ की पाँचवीं मंजिल। दो सौ चालीस सीटें, और एक वेंडिंग मशीन जिसमें कप हमेशा टेढ़ा गिरता था। शालिनी अब ट्रेनर थी। हर महीने चालीस नए लड़के-लड़कियाँ आते, ज्यादातर हरदोई, गोंडा, बलिया से। तीन महीने बाद उनमें से बीस बचते। उसने पहले हफ्ते नाम याद करना बंद कर दिया था।

विशाल का मामला उसे अब भी चुभता है। छह हफ्ते की ट्रेनिंग, फिर उन्नीस दिन काम, फिर एक दोपहर उसने कहा कि दूसरी जगह चार हजार ज्यादा मिल रहे हैं। शालिनी ने कहा, ठीक है, एक महीना पूरा कर लो, प्रोसेस बीच में है। उसने सिर हिलाया। अगली सुबह फोन बंद था। आईडी कार्ड आज तक वापस नहीं आया।

उस महीने क्लाइंट की कतार में सात सौ शिकायतें अटक गईं। शालिनी ने ग्यारह दिन तक लगातार दो शिफ्ट कीं।

अहलूवालिया सर ने एक बार कहा था, “हर सीट पर अस्सी हजार लगते हैं, शालिनी। और बासठ परसेंट लोग साल भर भी नहीं रुकते। तुम बताओ, हम क्या करें।”

वह जवाब नहीं दे पाई। इसलिए भी नहीं कि दो हजार तेरह में उसने खुद गुड़गाँव वाली नौकरी ऐसे ही छोड़ी थी। एक हफ्ते फोन बंद रखा था। उस रात उसकी शिफ्ट किसने सँभाली, यह उसने कभी नहीं पूछा।

मार्च में नया सिस्टम आया। पहले उसे सिर्फ जाँचना था। मशीन की बातचीत सुनो, हर जवाब पर सही या गलत का निशान लगाओ। दिन में चार सौ कॉल। शालिनी इसमें अव्वल निकली, क्योंकि उससे बेहतर कोई नहीं जानता था कि कौन-सा जवाब ग्राहक को भड़का देगा।

जुलाई तक मशीन की गलतियाँ खत्म होने लगीं।

अहलूवालिया सर ने हँसकर कहा, “ये कम से कम भागता नहीं।” दोनों समझ गए कि यह मजाक नहीं था।

अगस्त के बैच में चालीस की जगह छह लोग आए। दीपक हरदोई से था, पिता ने भैंस बेचकर अंग्रेजी वाला कोर्स कराया था। तीसरे हफ्ते ट्रेनिंग रोक दी गई। जाते हुए उसने पूछा कि मैडम, कहीं और सिफारिश कर देंगी क्या। शालिनी ने कहा, हाँ, जरूर। फिर रातभर सोचती रही कि किससे करे।

उसका मेल छब्बीस अगस्त को आया। भाषा बहुत नरम थी। भूमिका में बदलाव, नए अवसर, पैंतालीस दिन का नोटिस, और आखिर में ग्यारह वर्षों के लिए आभार। पैंतालीस दिन वह पूरे करेगी। यह उसी वक्त तय था।

एक बार मन में आया कि अगर विशाल जैसे लड़के न भागते तो शायद मशीन न आती। फिर उसने खुद को सुधार लिया। मशीन तब भी आती। सिर्फ बहाना दूसरा होता।

उस रात दो बजकर दस मिनट पर वह पार्किंग में कैब का इंतजार कर रही थी। उसने अपने फोन से कंपनी का टोल-फ्री नंबर मिलाया। तीन घंटियों के बाद आवाज आई।

“थैंक यू फॉर कॉलिंग, दिस इज़ रिया।”

नाम वही था। और “बिलिंग” शब्द वह उसी तरह थोड़ा खींचकर बोल रही थी, जैसे शालिनी ग्यारह साल से बोलती आई थी।

शालिनी कुछ नहीं बोली। आवाज ने तीन सेकंड इंतजार किया। “कोई बात नहीं। आप जब तैयार हों तब बताइए। मैं यहीं हूँ।”

पीछे कैब का हॉर्न बजा। शालिनी ने फोन कान से नहीं हटाया।

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