Doctor Ajay Goyal

माँ की दूकान

भीड़ रात नौ बजकर चालीस मिनट पर पुल की तरफ से आई।

सरिता देवी दुकान बंद कर चुकी थीं, पर हिसाब बाकी था, इसलिए भीतर बैठी थीं। शटर आधा गिरा हुआ था। नारे पहले दूर थे, फिर अचानक बिल्कुल सिर पर।

उन्होंने झिरी से देखा। लड़के थे। ज्यादातर बीस-बाईस के। कुछ के चेहरे जाने-पहचाने थे, जिनके फॉर्म उन्होंने पिछले महीने ही निकाले थे। एक ने बगल वाली टायर की दुकान का ताला लोहे के सरिये से तोड़ा। दो ने भीतर से कनस्तर निकाला।

काली टी-शर्ट वाले लड़के ने कनस्तर उड़ेला।

बाकी सब पीछे हट गए। इसलिए नहीं कि रोकना था, बल्कि इसलिए कि फ्रेम में आग पूरी आनी चाहिए। बीस-पच्चीस फोन एक साथ उठे हुए थे। कोई चिल्लाया, “थोड़ा साइड हो जा भाई, लाइट कट रही है।”

मुकेश हाथ जोड़कर बीच में आया। उसकी गुमटी वहीं थी, और उसके ऊपर वाले कमरे में उसकी माँ सोती थी। किसी ने उसे धक्का देकर नाली में गिरा दिया और कहा, “चाचा, बड़ी लड़ाई है। हट जाओ।”

आग दीवार पार करके दस मिनट में सरिता देवी की दुकान तक आ गई। वे पीछे के दरवाज़े से निकलीं। कैनन की मशीन भीतर रह गई, जिसकी चार किस्तें बाकी थीं। बच्चों के फॉर्म रह गए। बाबूजी के इलाज के बाद बची इकलौती चीज़ रह गई।

टायर की दुकान का चौकीदार रामकिशुन नहीं निकल पाया। बासठ साल का था। सुबह उसे बाहर लाया गया तो लोग बस इतना कह पा रहे थे कि पहचान में नहीं आ रहा।

दमकल पौने बारह बजे पहुँची, क्योंकि रास्ते में जलती हुई बसें खड़ी थीं। जिन लड़कों ने बसें जलाई थीं, वे तब तक जा चुके थे।

अगली सुबह गली में कोई नहीं आया। न कोई नेता, न कोई संगठन। सरिता देवी ने सुना कि ऑनलाइन कुछ ट्रेंड चल रहा है, पर उस दोपहर तक वह किसी और शहर का हो चुका था। यहाँ की राख अब पुरानी खबर थी।

अभय तीसरे दिन लौटा।

नया फोन था। पीछे कोई गोल-सी लाइट लगी थी, जिसे वह बार-बार ठीक कर रहा था।

“अम्मा, चालीस हजार फॉलोअर हो गए। वो वाली रील तेरह लाख गई।”

सरिता देवी ने मुँह नहीं उठाया। वे राख में से मशीन का ढक्कन निकाल रही थीं। पिघला हुआ था, पर उस पर सीरियल नंबर अब भी पढ़ा जा सकता था। किस्त वाले काग़ज़ में वही नंबर लिखा था।

“रामकिशुन काका मर गए,” उन्होंने कहा।

अभय ने फोन नीचे किया। दो सेकंड रुका।

“अम्मा, इतने बड़े बदलाव में छोटी-मोटी चीजें तो जाती ही हैं। सिस्टम खुद जिम्मेदार है। हम तो बस आवाज़ उठा रहे थे।”

फिर उसने पूछा कि चार्जर कहाँ है, क्योंकि बैटरी दस पर आ गई थी। सरिता देवी ने उसकी तरफ देखा और उसे बताया नहीं कि इस गली में अब बिजली का खंभा भी नहीं बचा।

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